आर० डी० न्यूज़ नेटवर्क : 10 नवंबर 2023 : रोहतास के माझीगांवा में प्रवचन करते हुए श्री जी और स्वामी जी महाराज ज्ञानमार्ग में दुःख, बन्धन मिट जाता है, और स्वरूप में स्थिति हो जाती है, पर मिलता कुछ नहीं । परन्तु भक्तिमार्ग में प्रतिक्षण वर्धमान प्रेम मिलता है।ज्ञान के बिना प्रेम मोह में चला जाता है और प्रेम के बिना ज्ञान शून्यता में चला जाता है जिसके भीतर भक्ति के संस्कार हैं और कृपा का आश्रय है, उसको मुक्तिमें सन्तोष नहीं होता। भगवान् की कृपा उसकी मुक्ति के रस को फीका करके प्रेमका अनन्तरस प्रदान कर देती है।अपने मत का आग्रह और दूसरे मत की उपेक्षा, खण्डन, अनादर न करने से मुक्ति के बाद भक्ति (प्रेम) की प्राप्ति स्वतः होती है।

भोगेच्छा का अन्त होता है और मुमुक्षा अथवा जिज्ञासाकी पूर्ति होती है, पर प्रेम-पिपासाका न तो अन्त होता है और न पूर्ति ही होती है, प्रत्युत वह प्रतिक्षण बढ़ती ही रहती है।संसारमें तो आकर्षण और विकर्षण ( रुचि- अरुचि) दोनों होते हैं, पर परमात्मामें आकर्षण-ही-आकर्षण होता है, विकर्षण होता ही नहीं, यदि होता है तो वास्तवमें आकर्षण हुआ ही नहीं। भगवत्प्रेम यज्ञ, तप, दान, व्रत, तीर्थ आदिसे नहीं प्राप्त होता, प्रत्युत भगवान्‌में दृढ़ अपनेपनसे प्राप्त होता है।तपस्या से प्रेम नहीं मिलता, प्रत्युत शक्ति मिलती है। प्रेम भगवान्‌में अपनापन होनेसे मिलता है।भगवत्प्रेम में जो विलक्षण रस है, वह ज्ञान में नहीं है। ज्ञान।में तो अखण्ड आनन्द है, पर प्रेममें अनन्त आनन्द है।भेद मत में होता है, प्रेम में नहीं । प्रेम सम्पूर्ण मतवादों को खा जाता है।भगवान्‌ की तरफ खिंचाव होनेका नाम भक्ति है। भक्ति कभी पूर्ण नहीं होती, प्रत्युत उत्तरोत्तर बढ़ती ही रहती है।भगवान्‌ के प्रेम के लिये उनमें दृढ़ अपनापन की जरूरत है और उनके दर्शनके लिये उत्कट अभिलाषाकी जरूरत है।संसार को जानोगे तो उससे वैराग्य हो जायगा और परमात्मा को जानोगे तो उनमें प्रेम हो जायगा।जिसका मिलना अवश्यम्भावी है, उस परमात्मा से प्रेम करो और जिसका बिछुड़ना अवश्यम्भावी है, उस संसार की सेवा करो।प्रेम वहीं होता है, जहाँ अपने सुख और स्वार्थ की गन्ध भी नहीं होती।जो चीज अपनी होती है, वह सदा अपनेको प्यारी लगती । अतः एकमात्र भगवान्को अपना मान लेनेपर भगवान्‌में प्रेम प्रकट हो जाता है।कितने आश्चर्य की बात है कि जो नित्य – निरन्तर विद्यमान रहता है, वह (परमात्मा) तो प्रिय नहीं लगता, पर जो नित्यनिरन्तर बदल रहा है, वह (संसार) प्रिय लगता है।

जब तक संसार में आसक्ति है, तब तक भगवान्‌में असली प्रेम नहीं है।संसार की सुख ही भगवत्प्रेम में खास बाधक है। अगर सुखासक्तिका त्याग कर दिया जाय तो भगवान् में प्रेम स्वतः जाग्रत् हो जायगा।जब तक नाशवान्‌ की तरफ खिंचाव रहेगा, तबतक साधन करते हुए भी अविनाशी की तरफ खिंचाव (प्रेम) और उसका अनुभव नहीं होगा। भगवान्‌ में अनन्यप्रेमका नाम राधातत्त्व है। जबतक संसारमें आकर्षण रहता है, तबतक राधातत्त्व अनुभवमें नहीं आता।भगवान्‌ में प्रेम होने के समान कोई भजन नहीं है। जब तक साधक अपने मन की बात पूरी करना चाहेगा, तबतक उसका न सगुण में प्रेम होगा, न निर्गुण में।मनुष्य प्रारब्ध के अनुसार पाप-पुण्य नहीं करता; क्योंकि कर्मका फल कर्म नहीं होता, प्रत्युत भोग होता है।प्रारब्ध का काम तो केवल सुखदायी – दुःखदायी परिस्थिति को उत्पन्न कर देना है, पर उसमें सुखी – दुःखी होने अथवा न होने में मनुष्यमात्र स्वतन्त्र है।यह सर्वज्ञ, सर्वसुहृद्, सर्वसमर्थ प्रभु का विधान है कि अपने पापसे अधिक दण्ड कोई नहीं भोगता और जो दण्ड मिलता है, वह अपने किसी-न-किसी पापका ही फल होता है।जो होता है, वह ठीक ही होता है, गलत होता ही नहीं । इसलिये करनेमें सावधान और होनेमें प्रसन्न रहना चाहिये।शास्त्रनिषिद्ध आचरण प्रारब्ध से नहीं होते, प्रत्युत कामना से होते हैं।एक ‘करना’ होता है और एक ‘होना’ होता है, दोनों का विभाग अलग-अलग है। ‘करना’ पुरुषार्थ के अधीन है और ‘होना’ प्रारब्धके अधीन है। इसलिये मनुष्य करने (कर्तव्य) में स्वाधीन है और होने (फलप्राप्ति) में पराधीन है।संसार से सर्वथा राग हटते ही भगवान्‌ में अनुराग (प्रेम) हो जाता है।

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