
रिपोर्ट: Rohtas Darshan चुनाव डेस्क | Uttar Pradesh | Updated: 2 मार्च 2026: होली का पर्व आते ही पूरा देश उत्साह, रंग और परंपराओं में डूब जाता है। गांव-गांव और शहर-शहर में लोग होलिका दहन की तैयारियों में जुट जाते हैं। लकड़ियां, उपले और सूखी टहनियां इकट्ठा की जाती हैं, ताकि बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक इस अनुष्ठान को विधिवत संपन्न किया जा सके।
लेकिन Uttar Pradesh के सहारनपुर जिले में स्थित बरसी गांव इस परंपरा से अलग एक अनोखी मिसाल पेश करता है। यहां होली का त्योहार पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, रंग-गुलाल उड़ते हैं, ढोल-नगाड़े बजते हैं, मिठाइयां बांटी जाती हैं—मगर गांव की सीमा के भीतर होलिका दहन नहीं किया जाता। यह परंपरा कोई नई नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था से जुड़ी हुई है।
महाभारत काल से जुड़ा ऐतिहासिक संदर्भ
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, बरसी गांव का इतिहास महाभारत काल तक जाता है। गांव में स्थित एक प्राचीन पश्चिम मुखी शिव मंदिर इस परंपरा का केंद्र है। कहा जाता है कि इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग स्वयंभू है और इसकी स्थापना लगभग 5000 वर्ष पूर्व हुई थी।
जनश्रुति है कि इस मंदिर का निर्माण कौरवों द्वारा करवाया गया था। महाभारत युद्ध के समय पांडव पुत्र भीम यहां पहुंचे और किसी कारणवश उन्होंने अपनी गदा मंदिर के मुख्य द्वार में फंसा दी। बलशाली भीम ने द्वार को पूर्व दिशा से घुमाकर पश्चिम दिशा की ओर कर दिया। तभी से यह मंदिर पश्चिम मुखी हो गया।
आम तौर पर देश के अधिकांश शिवलिंग पूर्वमुखी होते हैं, लेकिन बरसी का शिवलिंग पश्चिम दिशा में होने के कारण इसे अत्यंत दुर्लभ और पवित्र माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से पश्चिम मुखी शिवलिंग विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक माने जाते हैं।
होलिका दहन न करने की मान्यता
गांव में प्रचलित मान्यता के अनुसार, यदि यहां होलिका दहन किया गया तो उसकी अग्नि की लपटें भगवान शिव के चरणों तक पहुंच सकती हैं और उन्हें कष्ट पहुंचा सकती हैं। इसी श्रद्धा और भय-भक्ति के मिश्रण ने इस परंपरा को जन्म दिया।
ग्रामीणों का विश्वास इतना अटूट है कि पिछले कई हजार वर्षों से इस नियम का पालन किया जा रहा है। होलिका दहन के दिन गांव के लोग पास के अन्य गांवों में जाकर अनुष्ठान में शामिल होते हैं, लेकिन अपने गांव में अग्नि प्रज्वलित नहीं करते।
भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी कथा
बरसी गांव के नामकरण को लेकर भी एक पौराणिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि महाभारत काल में जब भगवान श्रीकृष्ण इस क्षेत्र में आए, तो उन्होंने इस स्थान को अत्यंत पवित्र और शांत बताया। उन्होंने इसे ब्रजभूमि के समान माना और यहां की पवित्रता की प्रशंसा की।
इसी घटना के बाद से इस गांव को “बरसी” कहा जाने लगा। स्थानीय लोग इसे भगवान कृष्ण के आशीर्वाद से जुड़ा स्थान मानते हैं।
रंगों की धूम, परंपरा का सम्मान
होलिका दहन भले ही नहीं होता, लेकिन धुलंडी के दिन पूरा बरसी गांव रंगों में सराबोर हो जाता है। बच्चे पिचकारियों से रंग उड़ाते हैं, युवा ढोल की थाप पर नाचते हैं और बुजुर्ग एक-दूसरे को गुलाल लगाकर शुभकामनाएं देते हैं। घर-घर में गुझिया, मालपुए और अन्य पारंपरिक पकवान बनते हैं।
यहां की होली इस बात का उदाहरण है कि परंपराएं समय के साथ बदलती नहीं, बल्कि आस्था और विश्वास के सहारे जीवित रहती हैं। बरसी गांव की यह अनूठी परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सांस्कृतिक विविधता और भारतीय परंपराओं की गहराई को भी दर्शाती है।


