1965–71 युद्धों में ईरान-अमेरिका की गुप्त भूमिका का खुलासा

रिपोर्ट: Rohtas Darshan चुनाव डेस्क | भारत–पाकिस्तान | Updated: 2 मार्च 2026: भारत–पाकिस्तान के 1965 और 1971 के युद्धों को लेकर चौंकाने वाले ऐतिहासिक दस्तावेज एक बार फिर चर्चा में हैं। शीतयुद्ध के दौर में ईरान के शाह Mohammad Reza Pahlavi ने अमेरिका के इशारे पर पाकिस्तान को सैन्य मदद पहुंचाई थी। उस समय व्हाइट हाउस में Richard Nixon और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार Henry Kissinger की रणनीति के तहत तेहरान–इस्लामाबाद के बीच गुप्त सहयोग स्थापित हुआ।

1965: जब ईरान बना पाकिस्तान का ‘हथियार मार्ग’

1965 के युद्ध के बाद पाकिस्तान पर पश्चिमी देशों से हथियारों की आपूर्ति मुश्किल हो गई थी। ऐसे में ईरान ने पर्दे के पीछे से अहम भूमिका निभाई। अमेरिकी रिकॉर्ड बताते हैं कि पश्चिम जर्मनी से खरीदे गए F-86 लड़ाकू विमान, एयर-टू-एयर मिसाइलें, तोपखाना और स्पेयर पार्ट्स पहले ईरान पहुंचे और फिर पाकिस्तान भेजे गए।

यह कदम केवल सैन्य मदद नहीं था, बल्कि प्रतिबंधों के बीच पाकिस्तान के लिए वैकल्पिक सप्लाई लाइन तैयार करना भी था।

1971: संकट की घड़ी में गुप्त कूटनीति

1971 में जब पूर्वी पाकिस्तान में हालात बिगड़े और भारत ने निर्णायक बढ़त बनाई, तब वॉशिंगटन में हलचल तेज हो गई। अमेरिकी अभिलेखों के अनुसार, पाकिस्तान के राष्ट्रपति याह्या खान ने तत्काल मदद की अपील की।

ईरान से सैन्य उपकरण और गोला-बारूद उपलब्ध कराने की योजना पर चर्चा हुई। शाह ने मदद की इच्छा जताई, लेकिन शर्त रखी कि अमेरिका बाद में उसकी भरपाई करेगा। हालांकि सोवियत संघ के साथ भारत की मैत्री संधि को देखते हुए शाह सीधे सैन्य हस्तक्षेप से बचते रहे और वैकल्पिक रास्ते सुझाए।

शीतयुद्ध की शतरंज: CENTO का समीकरण

ईरान, पाकिस्तान और तुर्किये 1955 से पश्चिम समर्थित CENTO गठबंधन के सदस्य थे। इस गठबंधन का मकसद सोवियत प्रभाव को संतुलित करना था। ऐसे में तेहरान और इस्लामाबाद की नजदीकी रणनीतिक रूप से अहम थी।

भारत ने उस दौर में गुटनिरपेक्ष नीति के साथ सोवियत संघ से सामरिक समझ विकसित की थी, जिसने क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित किया।

क्या सच में बदल जाता नक्शा?

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यदि ईरान की मदद नहीं मिलती, तो 1971 के बाद पाकिस्तान की स्थिति और कमजोर हो सकती थी। हालांकि इतिहासकार इसे कई कारकों का परिणाम मानते हैं—सैन्य रणनीति, अंतरराष्ट्रीय दबाव और महाशक्तियों की कूटनीति सबने मिलकर हालात तय किए।

इतिहास के पन्नों से सबक

1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान की विदेश नीति पूरी तरह बदल गई। लेकिन 1965 और 1971 के युद्धों में तेहरान की भूमिका यह दिखाती है कि दक्षिण एशिया की लड़ाइयां केवल सीमाओं तक सीमित नहीं थीं—वे वैश्विक शक्ति राजनीति का हिस्सा थीं।

यह खुलासा एक बार फिर याद दिलाता है कि युद्ध के मैदान से ज्यादा निर्णायक कई बार बंद कमरों में चल रही कूटनीति होती है।

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