
रिपोर्ट: Rohtas Darshan चुनाव डेस्क | पटना | Updated: 7 मार्च 2026: बिहार की राजनीति में हाल के महीनों में हुए घटनाक्रम ने सियासी परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया है। एक तरफ Nitin Nabin का भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना, दूसरी ओर Tejashwi Yadav का राष्ट्रीय जनता दल की कमान संभालना और अब मुख्यमंत्री Nitish Kumar का पद छोड़कर राज्यसभा जाने की तैयारी — इन तीनों घटनाओं ने बिहार की राजनीति में नए दौर की शुरुआत कर दी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार की सक्रिय राजनीति से विदाई मंडल राजनीति के एक महत्वपूर्ण अध्याय के अंत के रूप में देखी जा रही है। दिलचस्प बात यह है कि उनके कई करीबी भी अब यह कहते सुने जा रहे हैं कि “नीतीश कुमार क्या थे और क्या हो गए।”
आख़िरी चुनाव का संकेत पहले ही दे चुके थे
साल 2020 के विधानसभा चुनाव के दौरान Purnia में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए नीतीश कुमार ने कहा था कि यह उनका आख़िरी चुनाव है।
उन्होंने उस समय कहा था — “ये जान लीजिए कि यह मेरा आख़िरी चुनाव है। अंत भला तो सब भला।”
हालांकि उस चुनाव में उनकी पार्टी Janata Dal (United) को केवल 43 सीटें मिलीं, जो 2005 के बाद सबसे कम थीं। इसके बावजूद वह मुख्यमंत्री बने रहे। लेकिन इसके बाद से उनकी राजनीतिक छवि और शैली में धीरे-धीरे बदलाव दिखाई देने लगा।
छवि को लेकर हमेशा सतर्क रहे नीतीश
राजनीति में Nitish Kumar अपनी छवि को लेकर हमेशा बेहद सतर्क माने जाते रहे हैं। इसके विपरीत Lalu Prasad Yadav अपने अनौपचारिक अंदाज़ और जनसभाओं की शैली के लिए जाने जाते थे।
नीतीश कुमार को करीब से जानने वाले बताते हैं कि वह निजी बातचीत में भी काफी औपचारिक रहते थे। यही वजह थी कि वह कभी भी केवल एक जाति के नेता के रूप में नहीं देखे गए। उनकी स्वीकार्यता बिहार के लगभग सभी जाति और धर्म के लोगों में रही।
समाजवादी नेता Shivanand Tiwari एक पुराना वाकया बताते हैं। उनके अनुसार 1994 में आयोजित कुर्मी चेतना रैली में जाने को लेकर नीतीश कुमार पहले हिचकिचा रहे थे क्योंकि उन्हें डर था कि इससे दूसरी जातियों में गलत संदेश जाएगा। बाद में समझाने पर वह रैली में गए।
लालू के साथ टकराव और चुप्पी
झारखंड में जदयू के विधायक Saryu Roy बताते हैं कि 1992 में दिल्ली स्थित बिहार भवन में एक घटना ने नीतीश और लालू के रिश्तों में दरार पैदा कर दी।
उनके मुताबिक उस समय लालू यादव ने बातचीत के दौरान कुछ नेताओं के साथ अपमानजनक व्यवहार किया। उस समय नीतीश कुमार चुप रहे, लेकिन बाद में उन्होंने इस घटना को लेकर पत्र लिखवाया, जो मीडिया में प्रकाशित हो गया।
यही वह दौर था जब दोनों नेताओं के रास्ते धीरे-धीरे अलग होने लगे।
लालू को मुख्यमंत्री बनाने में नीतीश की भूमिका
दिलचस्प बात यह है कि 1990 में जब बिहार में मुख्यमंत्री चुनने का सवाल उठा, तब Lalu Prasad Yadav को मुख्यमंत्री बनाने में नीतीश कुमार की भी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है।
उस समय जनता दल में V. P. Singh और Devi Lal जैसे बड़े नेताओं के बीच मतभेद थे। अंततः विधायकों की वोटिंग में लालू यादव जीत गए और बिहार के मुख्यमंत्री बने।
2005 में शुरू हुआ नीतीश युग
लालू-राबड़ी शासन के बाद 2005 में नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ मिलकर बिहार में सरकार बनाई।
उस समय Bharatiya Janata Party और जेडीयू गठबंधन को बड़ी सफलता मिली और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। 2010 के चुनाव में यह गठबंधन और भी मजबूत होकर उभरा और विधानसभा में प्रचंड बहुमत हासिल किया।
उनके शासनकाल में सड़क, बिजली और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर काफी काम हुआ, जिससे उनकी छवि सुशासन बाबू की बनी।
मोदी से दूरी और फिर नजदीकी
2013 में जब Narendra Modi को भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया, तब नीतीश कुमार ने भाजपा से अलग होने का फैसला लिया।
लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में जेडीयू को भारी नुकसान हुआ और पार्टी केवल दो सीटों पर सिमट गई। इसके बाद बिहार की राजनीति में गठबंधनों का दौर शुरू हुआ और नीतीश कई बार पाला बदलते नजर आए।
क्यों कह रहे हैं लोग – “क्या थे और क्या हो गए”
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार का राजनीतिक उभार जिस विचारधारा और छवि के साथ हुआ था, उनका अंत उससे काफी अलग दिखाई देता है।
समाजवादी नेता शिवानंद तिवारी कहते हैं —
“हम कभी नीतीश कुमार को नरेंद्र मोदी के विकल्प के रूप में देखते थे, लेकिन उनकी राजनीतिक विदाई उनके अनुचर के रूप में हो रही है। यह एक दुखांत नाटक जैसा लगता है।”
बिहार की राजनीति में नया दौर
अब जब नीतीश कुमार के सक्रिय राजनीति से हटने की चर्चा है, तो बिहार की राजनीति में नया समीकरण बनता दिख रहा है।
एक ओर Tejashwi Yadav विपक्ष के प्रमुख चेहरे के रूप में उभर रहे हैं, वहीं भाजपा राज्य में अपनी राजनीतिक पकड़ और मजबूत करने की कोशिश में है।
ऐसे में राजनीतिक जानकार मानते हैं कि नीतीश कुमार की विदाई के साथ बिहार की राजनीति में एक युग का अंत हो रहा है और आने वाले वर्षों में राज्य की सियासत पूरी तरह नए नेताओं के इर्द-गिर्द घूम सकती है।
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