
रिपोर्ट: Rohtas Darshan चुनाव डेस्क | मुंबई | Updated: 4 मार्च 2026: वैश्विक तनाव के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा है। अमेरिकी-इजरायली हमलों के बाद ईरान के साथ बढ़ते संघर्ष और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने भारतीय बाजारों को हिला कर रख दिया। सिर्फ दो कारोबारी सत्रों में निवेशकों की करीब 9.7 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति साफ हो गई, जबकि भारतीय रुपया पहली बार डॉलर के मुकाबले 92 के पार चला गया।
💱 रुपया ऐतिहासिक निचले स्तर पर
भारतीय मुद्रा अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 55 पैसे टूटकर 92.03 पर पहुंच गई। इससे पहले जनवरी 2026 के अंत में 91.99 और 92.02 का स्तर दर्ज हुआ था, लेकिन इस बार रुपया मनोवैज्ञानिक 92 के स्तर को भी पार कर गया।
विश्लेषकों का मानना है कि सुरक्षित निवेश (सेफ हेवन) की ओर वैश्विक निवेशकों के झुकाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने रुपये पर दबाव बढ़ाया है।
📉 शेयर बाजार में भारी गिरावट
🔻 प्रमुख आंकड़े:
BSE Sensex: 1,710 अंक गिरकर 78,529 पर बंद — अप्रैल 2025 के बाद का निचला स्तर।
Nifty 50: 477 अंक फिसलकर 24,389 पर बंद — सात महीनों में पहली बार 24,400 से नीचे।
BSE का मार्केट कैप: 456.17 लाख करोड़ रुपये से घटकर 446.47 लाख करोड़ रुपये — करीब 9.7 लाख करोड़ रुपये का नुकसान।
🛢️ युद्ध और तेल का डबल असर
सप्ताहांत में Iran के खिलाफ United States और Israel की सैन्य कार्रवाई के बाद पूरे मध्य-पूर्व में तनाव फैल गया।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने संकेत दिया कि यह संघर्ष “चार से पांच सप्ताह” तक चल सकता है।
इस तनाव का सीधा असर ऊर्जा बाजार पर पड़ा।
Brent Crude उछलकर 82.53 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया — जनवरी 2025 के बाद का उच्चतम स्तर।
Strait of Hormuz में टैंकरों की आवाजाही प्रभावित होने से आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी।
भारत, जो अपनी तेल जरूरतों का लगभग 85% आयात करता है, उसके लिए यह स्थिति महंगाई और व्यापार घाटे के लिहाज से बेहद चिंताजनक है।
📊 किन शेयरों पर ज्यादा मार?
बिकवाली के बीच कई दिग्गज शेयर 3% से 6% तक टूट गए, जिनमें शामिल हैं:
Larsen & Toubro
IndiGo
Adani Ports
Mahindra & Mahindra
Bajaj Finance
विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने भी 3,295.64 करोड़ रुपये के शेयर बेचे।
🌏 वैश्विक बाजारों में भी हड़कंप
यह गिरावट केवल भारत तक सीमित नहीं रही।
दक्षिण कोरिया का KOSPI सूचकांक 12% से अधिक टूट गया, जो इस संघर्ष के वैश्विक असर को दर्शाता है।
🗣️ विशेषज्ञों की राय
Geojit Investments Limited के मुख्य निवेश रणनीतिकार वीके विजयकुमार के मुताबिक,
“भारत के नजरिए से असली चिंता मुद्रास्फीति और विकास पर इसके प्रभाव को लेकर है।”
उन्होंने चेतावनी दी कि लंबा युद्ध रुपये को और कमजोर कर सकता है, व्यापार घाटा बढ़ा सकता है और कॉर्पोरेट आय पर दबाव डाल सकता है।
हालांकि उन्होंने निवेशकों को घबराने से बचने की सलाह दी और कहा कि लंबी अवधि के निवेशक सुधार के दौरान गुणवत्तापूर्ण शेयरों में धीरे-धीरे निवेश कर सकते हैं।
🔎 आगे क्या?
अगर मध्य-पूर्व में तनाव लंबा खिंचता है और तेल 80–90 डॉलर के दायरे में बना रहता है, तो भारत में महंगाई, ब्याज दरों और बाजार की दिशा पर गंभीर असर पड़ सकता है।
फिलहाल निवेशकों की नजरें 16 मार्च के चुनावी घटनाक्रम और वैश्विक कूटनीतिक हलचलों पर टिकी हैं।
रुपये की कमजोरी और बाजार की गिरावट — क्या यह अस्थायी झटका है या लंबी उथल-पुथल की शुरुआत? आने वाले हफ्ते तय करेंगे।


