यूपी के 24 गांवों की 200 साल पुरानी ‘बैजला’ होली परंपरा

रिपोर्ट: Rohtas Darshan चुनाव डेस्क | कौशांबी/चित्रकूट | Updated: 4 मार्च 2026: Yamuna की शांत धाराओं के बीच, Kaushambi और Chitrakoot की सरहद पर बसे 24 गांवों में होली का रंग कुछ अलग ही कहानी कहता है।

जहां पूरे देश में धुलेंडी के दिन ढोल-नगाड़ों की गूंज और गुलाल की उड़ान होती है, वहीं इन गांवों में उस दिन सन्नाटा पसरा रहता है। गलियां सूनी, चौपाल पर गंभीर बैठे बुजुर्ग और रंगों से दूरी बनाए बच्चे—यह दृश्य किसी त्योहार का नहीं, बल्कि शोक का प्रतीक लगता है।

यहां धुलेंडी को ‘बैजला’ कहा जाता है—यानी शोक का दिन।

दो सौ साल पुरानी बलिदान की कहानी

स्थानीय जनश्रुति के मुताबिक, जमींदारी दौर में बेरौंचा गांव के एक जमींदार पर जंगल में अचानक जंगली जानवर ने हमला कर दिया। उनके साथ चल रहे वफादार सेवक बैजू ने बिना देर किए जानवर से भिड़ंत कर दी।

संघर्ष बेहद भयंकर था। बैजू ने अपने स्वामी की जान तो बचा ली, लेकिन खुद गंभीर रूप से घायल हो गया।

जब उसकी सांसें टूटने लगीं, तो जमींदार ने पूछा—

“बैजू, तुम्हारी आखिरी इच्छा क्या है?”

बैजू ने धीमी आवाज में कहा—

“मालिक… होली के दिन मेरे नाम पर शोक मनाइएगा। उस दिन रंग मत खेलिएगा… ताकि लोग याद रखें कि एक सेवक ने अपना कर्तव्य निभाया था।”

जमींदार ने वचन दिया। और तभी से इन 24 गांवों में होली का रंग एक दिन के लिए ठहर जाता है।

धुलेंडी पर सन्नाटा, नहीं बजता ढोल-नगाड़ा

धुलेंडी के दिन इन गांवों में:

न ढोल बजता है

न गुलाल उड़ता है

न रंगों की मस्ती होती है

लोग सादगी से दिन बिताते हैं। इसे ‘बैजला’ कहा जाता है—बैजू की स्मृति में मनाया जाने वाला मौन दिवस।

अगले दिन ‘बैज की होली’ में उमड़ता है रंगों का सैलाब

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

अगले दिन, जब भाईदूज का सूरज उगता है, तो वही गांव रंगों से सराबोर हो उठते हैं। इसे यहां ‘बैज की होली’ कहा जाता है।

अबीर-गुलाल उड़ता है, ढोलक की थाप गूंजती है, लोकगीत गाए जाते हैं और घर-घर में पारंपरिक पकवान बनते हैं।

मानो पूरा गांव एक स्वर में कह रहा हो—

“बलिदान की याद भी रहे, और जीवन का उत्सव भी।”

आज भी निभाई जाती है परंपरा

कौशांबी और चित्रकूट के 12-12 सीमावर्ती गांव आज भी इस दो सौ साल पुरानी परंपरा को पूरी निष्ठा से निभाते हैं। प्रशासन की निगरानी में यह अनोखी होली शांति और अनुशासन के साथ मनाई जाती है।

गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि यह सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि वचन, कर्तव्य और बलिदान की विरासत है।

इतिहास की जीवित याद

यमुना आज भी वैसे ही बहती है। मौसम हर साल बदलता है। नई पीढ़ियां जन्म लेती हैं।

लेकिन जब होली आती है, तो इन 24 गांवों में एक दिन के लिए रंग थम जाते हैं—ताकि इतिहास की वह कहानी फिर से जीवित हो सके, जिसमें एक सेवक ने अपनी निष्ठा से परंपरा को अमर कर दिया।

यह अनोखी होली बताती है कि त्योहार सिर्फ रंगों का नहीं, संस्कारों और स्मृतियों का भी उत्सव है।

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