CBI ने केजरीवाल-सिसोदिया की बरी को हाईकोर्ट में दी चुनौती

रिपोर्ट: Rohtas Darshan चुनाव डेस्क | नई दिल्ली | Updated: 3 मार्च 2026: दिल्ली की बहुचर्चित आबकारी नीति मामले में बड़ा कानूनी मोड़ सामने आया है। Central Bureau of Investigation (CBI) ने पूर्व मुख्यमंत्री Arvind Kejriwal, पूर्व उपमुख्यमंत्री Manish Sisodia समेत 23 आरोपियों को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को Delhi High Court में चुनौती दी है। एजेंसी ने राउज एवेन्यू कोर्ट के आदेश को “कानून और तथ्यों के विपरीत” बताते हुए कहा है कि विशेष न्यायाधीश ने आरोप तय करने के शुरुआती चरण में ही “मिनी ट्रायल” चला दिया।

मामले पर हाईकोर्ट 9 मार्च को सुनवाई करेगा।

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद वर्ष 2021-22 की दिल्ली सरकार की नई आबकारी (शराब) नीति से जुड़ा है, जिसे बाद में वापस ले लिया गया था। CBI का आरोप है कि नीति तैयार करते समय ऐसे प्रावधान जोड़े गए, जिनसे कुछ निजी कंपनियों को लाभ पहुंचा और बदले में कथित आर्थिक फायदा लिया गया।

27 फरवरी को राउज एवेन्यू कोर्ट के विशेष न्यायाधीश जीतेंद्र सिंह ने अपने आदेश में कहा था कि CBI द्वारा पेश दस्तावेजों और साक्ष्यों से प्रथम दृष्टया भी कोई ठोस मामला नहीं बनता। अदालत ने टिप्पणी की कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री किसी भी आरोपी के खिलाफ गंभीर संदेह तक उत्पन्न नहीं करती, इसलिए सभी 23 आरोपियों को आरोपों से मुक्त किया जाता है।

CBI की 974 पन्नों की अपील में क्या दलील?

CBI ने हाईकोर्ट में 974 पन्नों की विस्तृत अपील दाखिल की है। एजेंसी का कहना है:

विशेष न्यायाधीश ने आरोप तय करने के चरण में ही गहराई से साक्ष्यों का विश्लेषण कर दिया, जो इस स्तर पर आवश्यक नहीं था।

जज ने पूरे कथित षड्यंत्र को समग्र रूप से देखने के बजाय अलग-अलग हिस्सों में बांटकर परखा।

अभियोजन के सबूतों को “चुनिंदा तरीके” से पढ़ा गया और महत्वपूर्ण तथ्यों को नजरअंदाज किया गया।

जांच एजेंसी और जांच अधिकारी के खिलाफ की गई प्रतिकूल टिप्पणियां अनुचित और आधारहीन हैं।

CBI का तर्क है कि आरोप तय करने के चरण में अदालत को केवल यह देखना होता है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं, न कि विस्तृत साक्ष्य मूल्यांकन करना।

शराब नीति में बदलाव पर क्या आरोप?

एजेंसी के मुताबिक:

थोक शराब व्यापार को निजी हाथों में सौंपा गया।

मुनाफे का मार्जिन 5% से बढ़ाकर 12% किया गया।

टर्नओवर शर्तों में ढील दी गई, जबकि विशेषज्ञों ने पुरानी व्यवस्था बनाए रखने की सलाह दी थी।

CBI का दावा है कि यह सब “क्विड प्रो क्वो” यानी कथित लेन-देन की योजना का हिस्सा था। एजेंसी ने कहा है कि उसके पास वरिष्ठ अधिकारियों के बयान और डिजिटल साक्ष्य मौजूद हैं, जो इस कथित साजिश की ओर संकेत करते हैं।

CBI ने यह भी आरोप लगाया है कि कथित अवैध धन का इस्तेमाल गोवा विधानसभा चुनाव में किया गया। हालांकि ट्रायल कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि गोवा चुनाव से जुड़े आरोप अधिकतर अनुमानों पर आधारित हैं, न कि ठोस कानूनी प्रमाणों पर।

जज के फैसले पर एजेंसी की आपत्ति

CBI का कहना है कि विशेष न्यायाधीश ने साजिश के मूल ढांचे को नजरअंदाज कर दिया और छोटे-छोटे विरोधाभासों पर अधिक ध्यान दिया। एजेंसी का दावा है कि:

कानून के सिद्धांतों का सही अनुप्रयोग नहीं किया गया।

आरोपियों की भूमिकाओं को अभियोजन के कथन से अलग तरीके से परिभाषित किया गया।

आदेश “स्पष्ट रूप से त्रुटिपूर्ण और तथ्यों की गलत व्याख्या” पर आधारित है।

अब आगे क्या होगा?

हाईकोर्ट 9 मार्च को CBI की अपील पर सुनवाई करेगा। संभावित स्थितियां:

यदि हाईकोर्ट को लगता है कि ट्रायल कोर्ट ने कानून की गलत व्याख्या की है, तो मामला दोबारा ट्रायल के लिए भेजा जा सकता है।

यदि हाईकोर्ट ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराता है, तो आरोपियों को मिली राहत बरकरार रहेगी।

यह मामला न केवल कानूनी बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी बेहद अहम माना जा रहा है। अब सबकी नजर दिल्ली हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी है, जहां यह तय होगा कि आबकारी नीति प्रकरण का अगला अध्याय किस दिशा में जाएगा।

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